घनघोर घटा घिर अम्बर आई ,
बूंदन के बाण चलाये रे ,
सखी रे यो सावण है के ,
मोरी अँखियाँ से नीर बहा जाये रे।
इस पानी का रंग लाल भया ,
मोरे सबर का अब इंतकाल भया।
मोरो एक संदेशो रखियो ,
सखी रे मोरे पिया से जा के कहियो,
बड़े दिनन तक राह मैं तक्यो,
ना वो आयो , ना तो वाको संदेशो आयो।
मैं राह ताकि थी निसदिन बर्सों ,
कौन ख़ता थी ऐसी मेरो,
जो वो ऐसो रूठा है।
मैं प्राण बिछाये बैठी थी,
साजन तोरे आवन की खातिर,
रस्ते पर आँख बिछाये बैठी थी।
इस कठिन डगर पर जीवन की,
हर रिश्ता मुझसे छूटा था,
या फिर वो मेरा ईश्वर ही ,
मुझसे कुछ रूठा था।
बहुत सम्भाली अब ना सम्भले ,
यो जीवन की म्हारी गगरी छलकी जाये,
श्याम की मूरत रोज निहारूं ,
पूछ-पूछ मैं थक-थक हारूं ,
कब पाऊँगी दरस तुम्हारे,
राधे से रोज यही मैं मांगू,
मोहे मेरो श्याम, हे पटरानी।
प्राण पखेरू जात हैं मोरे,
छोड़ धरा पर पिंजरा आपन।
एक अरज है तोसे मोरी की,
जो आयो अर्थी पर मोरी,
मोरी अँखियाँ बंद ना कीजो ,
आलिंगन तो पा ना सकी,
मोरी चिता को आपन दरसन दे के जइयो ,
जो समझ्यो इस काबिल मोहे,
मोरे माथे पर,रज अपने चरनन की,रख के जइयो,
पिया रे मोरी चिता को आपन दरसन दे के जइयो।
प्रानी .....
बूंदन के बाण चलाये रे ,
सखी रे यो सावण है के ,
मोरी अँखियाँ से नीर बहा जाये रे।
इस पानी का रंग लाल भया ,
मोरे सबर का अब इंतकाल भया।
मोरो एक संदेशो रखियो ,
सखी रे मोरे पिया से जा के कहियो,
बड़े दिनन तक राह मैं तक्यो,
ना वो आयो , ना तो वाको संदेशो आयो।
मैं राह ताकि थी निसदिन बर्सों ,
कौन ख़ता थी ऐसी मेरो,
जो वो ऐसो रूठा है।
मैं प्राण बिछाये बैठी थी,
साजन तोरे आवन की खातिर,
रस्ते पर आँख बिछाये बैठी थी।
इस कठिन डगर पर जीवन की,
हर रिश्ता मुझसे छूटा था,
या फिर वो मेरा ईश्वर ही ,
मुझसे कुछ रूठा था।
बहुत सम्भाली अब ना सम्भले ,
यो जीवन की म्हारी गगरी छलकी जाये,
श्याम की मूरत रोज निहारूं ,
पूछ-पूछ मैं थक-थक हारूं ,
कब पाऊँगी दरस तुम्हारे,
राधे से रोज यही मैं मांगू,
मोहे मेरो श्याम, हे पटरानी।
प्राण पखेरू जात हैं मोरे,
छोड़ धरा पर पिंजरा आपन।
एक अरज है तोसे मोरी की,
जो आयो अर्थी पर मोरी,
मोरी अँखियाँ बंद ना कीजो ,
आलिंगन तो पा ना सकी,
मोरी चिता को आपन दरसन दे के जइयो ,
जो समझ्यो इस काबिल मोहे,
मोरे माथे पर,रज अपने चरनन की,रख के जइयो,
पिया रे मोरी चिता को आपन दरसन दे के जइयो।
प्रानी .....