Wednesday, 5 December 2012

PERCHAIN...



kal rat sapne me ek parchain najar aai the...
mager na jane kyoun wo tasveer,
kuch dhundhali see najar aai the..
akhaksh to kuch pahchana saa tha,
mager saqsiyat kuch dhumil najar aai the..
pahle socha tu hogi,
phir socha amma hogi.
kyounki,
amma meri kahti the,
sapno me wo he najar aate hain,
jinka khayal kar hum,
need ko gale se lagate hain..
pahle najar aati the amma,
phir tu najar aane lage,
to maine socha kee,
amma sach kaha karti the meri.
mager kal  raat jo kuch ghata,
to ab sochta hoon kee,
kya amma mere sach kahtee the?
kyounki kal raat bhe to,
teri he tasveer dekh soya tha mai.
to phir kyoun tere chehre mein,
akhash kisi aur ka najar aaya tha mujhe....
achambha to ye tha mujhe ke,
mai to bana phirta tha hindu,
phir kyoun us akhash me mujhe,
ek muslim ladki ke,
masumiyat najar aai thee...
                                                                                             P R A N I....

Saturday, 1 December 2012

JHAROKHE KE BAHER

मेरे घर की एक दीवार जो मुह्हले की सड़क की ओर खुला करती है,
पहले उसमे एक झरोखा हुआ करता था ,और ,
मैं हर शाम उससे हाथ बाहर निकाल  मोहल्ले में झाँका करता था।
और आते जाते हर इंसान को  देख हाथ हिलाया करता था।
मगर,एक रोज मेरे घर वालो ने उसपे शीशा चढवा दिया,
तो अब मै चुपचाप उसके पीछे बैठ बाहर देखा करता था।
मोहल्ले में जो कुछ दीखता था,वो कुछ इस प्रकार थी,
एक नयी सी मस्जिद ,एक पुराना सा मंदिर,
एक पुरानी  सी नीम, एक छोटा सा चबूतरा,
और उसपे  बैठे कुछ लोग,जिन्हें मेरे पापा आवारा  करते थे।
खैर, एक दिन की बात है,
मुह्हले में इस बात पे तनातनी हो गयी की,
अगर मस्जिद नयी  है तो मंदिर भी  नया क्यूँ ना बने।
इस बात को सुरु तो पंडित जी और मौलवी जी ने किया था,
मगर बाद में हर कोई उस दंगे में पड़ गया  था।
उस समय ना जाने क्यूँ,
पिताजी ने मुझे भैया के यंहा भेज दिया।
कुछ सालों बाद जब मैं घर वापस आया तो,
कुछ देर बाद मुझे झरोखे की याद  आई,
मै  भाग कर उपर पंहुचा,
सीशा कुछ धुंधला हो गया था।
मैंने बाहेर झाँका,
ना तो नया मंदिर बना था और ना तो नयी मस्जिद,
हाँ   एक बदलाव था की अब तो,
मंदिर भी पुराना नजर आता है ,
मस्जिद भी पुरानी नजर आती है।
मगर  उस पुरानी  सी नीम के नीचे बैठे वही  लोग,
जिन्हें मेरे पापा आवारा कहा करते थे।।।।।।

                                                                     PRANI....

Saturday, 27 October 2012

GAREEB.....

 था शाम का हंसी सा शमा ,
निकले थे  लैला और मजनू शैर  पे।
था चल रहा अदभुत प्रेम प्रसंग,
थे खुश बड़े होकर के संग।
की इतने में हुआ उनका मोह भंग।
लैला का दुपट्टा किसी ने खिंचा,
उन दोनों का ध्यान उसने अपनी और भींचा।
मुड़कर जो  देखा उन्होंने पीछे,
कांपते हाथो को  किए आगे,
उस गुलाबी जाड़े में खड़ा नदीम था।
 एक हरी सी निक्कर पारो में डाले,
और एक फटा  सा लाल कुरता  तन पर लपेटे,
 उस गुलाबी जाड़े में खड़ा नदीम था।
"साहब कुछ खाने   को हो तो देना,
ना हो अगर कुछ तो मुझे,
एक रूपया ही  आगे बढ़ाना,
उतने में ही आज खा लूंगा मै,
कम से कम आज तो जी लूँगा मै।"
नदीम की उम्र थी वही कोई 12 साल,
चेहरा था सुखा और,
आँखे थी भूख से लाल।
 मगर ना कुछ कह पाई वो उनसे,
और ना ही कुछ पढ़ पाए वो उनमे।
दोनों एक स्वर में ही बोले,
चलो मेरे यार आगे बढ़ो।
कांपते पाओं से आगे बढ़ गया वो नदीम,
 फिर घने कोहरे में खो गया नदीम।
कुछ देर और बैठे वंहा वो,
फिर चले होटल को अपने,
डाल  कर हाथो में हाथ।
शाम का  भोजन लगा था,
लैला थी भूखी बहुत,
मजनू भी भूखा बहुत था।
अब थी आई बिल देने की बारी,
बिल हुआ था 1430,
मजनू ने टिप  में दिए  20 ,
वेटर बोला" क्या शाहब केवल  20.  "
लैला ने दिए  उसको और 30.
 लौट के आये कमरे में अपने,
बोली मजनू से लैला बड़े प्यार से,
जानू आज जरा जल्दी  है  सोना।
 सुबह उठ के ऑडिटोरियम है जाना,
पर नीद नहीं  है मुझको,
 बस इसी चेह्लोकदम में रात गुजर जाती है,
और सबेरा उनका दरवाजा खटखटाता है।
लैला सज संवर के पंहुची वंहा पे,
हाथो में जन्हा थी सबके एक किताब,
सीर्सक था जिसका "garibi by laila khan"
और वन्ही बाजू में था एक कब्रिस्तान,
 जिसमे था एक कब्र खोद रहा करीम,
जिसकी सिल था खुदा "NADEEM"  

                                                         PRANI.....
    

Thursday, 18 October 2012

जब न्याय किसी निद्रित शव सा है पड़ा,
जब जर्जर हो चुके हैं समाज के स्तम्भ ,
और परम्पराओ के महलो में गूंजती हैं आवाजे दीमको की,
मन में एक चिंगारी उठती है बगावत  की।
जब ईमानदारी की राह में खुदी है खाई,
जब पैरवी होती है दहशतगर्दो  की ,
और सुरक्षा जरायम के रखवालो की,
मन में एक चिंगारी उठती है बगावत की।
जब कोशिशे होती है आत्मा के व्यापार की,
जब इक्षाशक्ति हो व्यवस्था  परिवर्तन की,
और आव्यसकता होती है पुनर्जागरण की।
तभी सुरुआत होती है बगावत की।
ये जो तुमने कोशिस की थी बगावत की,
इसमें निशानियाँ थीं आधी बगावत की।
अब चाहते ख़त्म हो चुकी है  स्वशासन की,
क्यूंकि अब आव्यसकता है तिलक के  स्वराज्य की।
जरूरते अब नहीं है आधी बगावत की।
अब है जरूरत ऐसी  बगावत की,
जिसमे राह छुपी हो इंसानियत की मुस्कराहट की।
                                                                       abhishek naman dwiz.

Saturday, 29 September 2012

UNKI YADON ME.

 उनकी    यादों में  दिल  से  तो खूब   रोया ,आँखों  से रो ना  सका।  
उनको  पाने की खाव्हिश  की, जिनका  कभी  हो ना सका।
इन्ही कम्बक्त  आँखों से देखता रहा, उन्हें  दूर जाते   हुए,
  मगर अपने इस मंजर  पर  भी फूट कर रो ना सका।
उनकी हर एक याद   सीने से लगाये   हुए ,
मै  एक रात भी चैन  से सो ना सका।
उनको   चाहा था हर घडी मैंने ,
मगर  जुबां से ये  बात  कह ना सका।
उनकी एक मुस्कान पे   ,जिन्दगी  थी  कुर्बान मेरी।
मगर अफ़सोस है की,हाल-ऐ-दिल उनसे   कह ना सका।
उनको पलकों पे  रखने की चाहत थी ,
उनकी आँखों में बस  जाने की खवाहिश थी,
मगर  क्या करु ............
पास उनके  कभी रह ना सका।
वो  तो कब का चले गए थे  छोड़  मुझे तनहा अकेला,
मगर मै  आज तलक ,उनकी यादों   के बिना  रह ना सका।
उनकी यादों में दिल से तो खूब रोया,
आँखों से रो न सका ,की उनको पाने की खाव्हिश की,
जिनका कभी हो न सका।
                                 P R A N I.

Tuesday, 25 September 2012

dharmnirpechhta.

 धर्मनिर्पेछ्ता  का  अर्थ   यह  कदाचित    नहीं     है   कि


     आपको    किसी   एक   विशिष्ट  धर्म    के     पालन    

का   अधिकार    नहीं   है।
                                        dwiz 

Sunday, 23 September 2012

TUU

कहती है धडकन  बार बार की ,

काश तुने ना  छोड़ा होता साथ , 

तो हम भी कुछ यूं ना होते 

तन्हा रातो में ना करवट बदल बदल  के रोते ..

एक बार जो samagh गयी  होती mughe तू ,

तो तेरी  राहों में इतने   गम ना होते । 

एक बार बताया तो होता ,

कुछ ऐसा कर जाते  की ,

तेरी धड़कन में हम ही  हम  होते।

आज भी कहते हैं हम की 

आज जो रोता है तू यूं ,

साथ उनके होकर के।

साथ जो रोता हमारे ,

तो,

इस दुनिया में हम न होते। 


Saturday, 22 September 2012

JANGIEN

Pal do pal ke khata hoti hai ,
Sadiyoun ko saza hoti hai.......
Ek lamhe ke gustakhi se,
Khatm sadiyoun ke fija hoti hai,
Sadiyan gujar jaati hain,
Ek aashiya banana me.....
Warsho nikal jaate hai,
Ek gulistan sajaane me mager,
Ek pal he hai kaafi bahut,
Is bagiya me tufan lane ko...
Badi jaalim se hoti hai ye jaange,
Bus Kuch serfiro ke jid pe he khali,
Laakhon ka janaza utha leti hain......
Ek pal ke is naadani se,
Peedhiyan hoti mahroof aazadi se,
Warsono ke virasat bus youn he gujar jaati hai,
ek lamhe ke barbadi me.
Hum laakh kar de unsuna inko mager ,
Kambaqt inki goonj badi door talak  jaati hai...........

JUGNU

uthte he jugnu maa se bola,maa bahut bhookha hoon mai.
ab to mughe kuch de he de tu  khane ko,
aaj  na rah paunga mai maa,
pet to hai  mil gaya jaise mere peeth se,
lar tak hai na tapakti,ab mere is jeebh se.
rat to hai kat he jati jaise na taise sahi,
so leta hoon ghootno ko apne galo me he dalker.
mager maa lakh koshisho ke bad bhe,
din gujar paata nahi hai,  
ab to mughe kuch de he de tu khane ko.
sunne ke itna baad se the bichari ro padi,
mager karti bhi kya bebas the wo bichari.
phir wahi ghooti kahni, phir wahi ghoota fasana,
aaj aur tu kat le ai lal mere,
kal mai doongi bharpet tughko khane ko.
us raat soya tha badi umeed se wo jugnu,
mager us raat sone ke baad se,
phir na uth paya wo jugnu,
chhod kar jallim ye duniya aasma me chaya wo jugnu.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               
                                                                             PRANI