Wednesday, 18 December 2013

kisi ke liye kuch...

 जिंदगी के कुछ हंसीन किस्से भुला आया हूँ,
मैं कुछ ग़मों की तलाश में,
अपनी सारी  खुशियां लुटा आया हूँ। 
मैं एक स्वप्न की तलाश में,
अपने शक्शियत भुला आया हूँ। 
सफेदपोशों की नुमाइश लगी थी,
मेरे मोहल्ले में कल,
अपनी  बेइमानी बचाने को मैं भी,
उस मेले  में अपनी सारी ईमानदारी बेंच आया हूँ। 
 बहुत करीब थी दिल के मेरे,
इसलिए उस काली कमीज़ के लिए अपनी,
सैकड़ों सफ़ेद कैमीज़ें बेंच आया हूँ। 
अब तो हो ही जाउंगा  कामयाब मैं भी,
क्योंकि कल शाम मेले में मैं,
अपने इंसानियत बेंच आया हूँ। 

                                               प्रानी   .....

Tuesday, 19 November 2013

मय

tried some in ANUPRASH ALANKAAR...(repetition of a word many times...  )

मय =घमण्ड 

* मेरा मय मुझको ही मारे,

 और मैं जानु ना। 

या फिर जानु सबकुछ मैं ,

और करूँ कछ नाय। 

मेरा मय  कहता है मुझसे ,

मुझसे बड़ा ना कोई ,

और मैं कहके हाँ इस मन में ,

देता मय को बढ़ा। 

फिर कोई कहता   जो मुझसे ,

मैं रहता  हूँ मेरे मय में। 

मैं कहता हूँ झूठा है तू ,

तुझको यूँ दिखता है क्योंकि ,

तू रहता है तेरे मय में। 

मेरा मय  कहता है मुझसे ,

मैं इस  नगरी का वासी हूँ ,

तेरा मय कहता है तुझसे ,

तू उस नगरी का  वासी है। 

इस झूठे मय के चक्कर में,

मैं भी  भूला तू भी भूला ,

 हम एक धरा के वासी हैं। 

इस मय ने खींची दीवार ऐसी की ,

मैं मेरे को हिंदुस्तान कहता हूँ,

तू तेरे को पाकिस्तान कहता है। 

                                             PRANI.... 

Saturday, 24 August 2013

VIRAKTEE.....

विरक्ति या आशक्ति, बस जीवन की अभिव्यक्ति।
संयोग  की अभिलाषा या फिर वियोग की परिभाषा।
धूमिल जीवन, उजड़ा गुलशन,झिलमिल चिलमन।
……यादों के एक कहानी है,धागे में जिसे पिरोनी है। 
घिरता अम्बर या  ढलती सी शाम,
काश की कुछ तो हो मेरे भी साथ। 
…… यादों की एक कहानी है,धागे में जिसे पिरोनी है,
शायद फिर उनमें रंग भरें,
टूटे सपनों को पंख लगें।।
निर्झर सा तन,पतझर सा मन,
काली सी रात,खाली सी बात,
काश की हो मेरे भी साथ।  
…… यादों की एक कहानी है,धागे में जिसे पिरोनी है। 
फिर शायद मालाएं भी गूथूंगा उनसे,
एक शाम मिल पूछूंगा उनसे। 
शायद की उनके गले पड़े,
या टूट हवा में बिखर पड़ें। 

ये वक़्त बुरा था जीवन का,
या सुन्दरता की अभिलाषा थी। 
भटका सा पथ,भूली सी राह,
या सब बस पलकों का मयजाल। 
सपनों का रंग तो नीला है,
शायद  की दामन गीला  है,छोड़ो भी अब जाने दो,
मेरा जीवन ही कुछ धीमा है,
शायद ये मेरे अरमानों की सीमा है। 
काश कभी मुड़ पाउँगा मैं,
लौट यंही आऊंगा फिर मैं,
आखिर……. यादों की एक कहानी है,
उनको भी तो अभी सुनानी है………

                                              PRA.NI.

Saturday, 27 July 2013

humara watan

Kanha se log kahte hain desh me badhaali hai,
Har taraf to chayi khushhaali hai...
Peene ko kamskam maila he sahi,
Do ghoont paani to hai.
Kwan kahta hai is desh mein,
Gareebon ke liye khana nahi hai,
Ja ke dekho to humare hukmrano ke gharo ke peeche,
Khane ke liye kamskam joothi he sahi,
Kuch rotiyan to padi hain.
Wo jamne kuch aur the ,
Jab neta choriyan kiya karte the.
Ab to kamskam har neta arbpati to hai,
Ab jaane bhe do kargil ke baaten,
Ab har wajir-e-aajam phati dhoti kaise pahne.
Kyoun poochte hain jaanab,
Aap desh ke haalat purani baat hai,
Kuch naya kahiye kamskam aapke munh se,
Desh ko de gayi gaaliyan bahoot pasand aati hain.
Are taqdeer mein tha humare pichadna,
To kya hume langda he samajh lenge aap.
Waise bhe ab to likhne me bhe maza aata hai,
Humare desh me bhe chamchamati sadke hain,
Bhale he uske aajo baajo kuch jaanwaron jaise logon ka aashiyaan hai,
Humare yanha to ab gangajal dukano pe bikta hai, kyounki ganga to ab kuch jada he saaf hai.
Kwan kahta hai sadko pe bheed hai,
Kanhe kisi laal batti ka kaafila dekhiye to sahi.
Gujari baate hain ab daamini aur godhara jaise baaten,
Aaj to apne pahchaan batana bhe paap hai.....
                                                             PRANI

Tuesday, 2 April 2013

TALAASH.........

आओ  आज फिर जिन्दगी की तलाश करते हैं।
 ज़रा देर के लिए ही सही मगर ,
इस चिलचिलाती धूप में,
आओ आज किसी छांव की तलाश करते हैं।।
अरशों पूरानी हो चुकी हैं ये दीवारें,
आओ इनकी उखड़ी सी दरारों में ,
किसी फुरसत भरे लम्हे की तलाश करते हैं।।
बड़ी तंगहाल हैं मुहल्ले की गलियाँ,
आओ अब इन रास्तों का बहिष्कार  करते हैं।।
एक अर्शा बीता दीवाली मनाये,
आओ आज फिर किसी नदीम के घर ,
एक दीपक  उजियार करते हैं।।
बड़ी लम्बी हुई ये जालिम जुदाई,
आओ आज साथ मिल रोज़ों का इफ़्तार करते हैं।।
बड़े गहरे जख्म हैं इतिहास के,
कुछ तुम भूलो कुछ हम भूलें।
आओ आज साथ मिल,
किसी पगडण्डी की तलाश करते हैं।।
बहूत भीड़ हैं इन शहरों में,
आओ आज गाँव की किसी,
धुल भरी सड़क की तलाश करते हैं।। 

                                                     PRANI........

Monday, 18 February 2013

kuch bikhare se shair

टूटा हुआ दिल लिखा है जरा इनायत से पढना।
लहू को बेरंग आंसू लिखा है,शिकायत ना करना।
ऐ मेरे  मगरूर  सनम,तोड़ा है दिल मेरा,फिर
किसी और से मोहब्बत करने की,हिमाकत ना करना।।


आँखे,होठ,दिल और जबां ,इन्हें रखना जरा महफूज।
तुम तो ना कहोगे,
कंही ऐसा ना हो ,ये सब मिलकर कह दें हमे महबूब।।

ये आँखों का आँखों से मिलना सनम,
ये पलकों का हया से झुकना सनम,
यूं ही बेवजह तो ना होगा।
जरूर तेरे दिल में मेरा ख्वाब होगा।।

इन आँखों की शोखियों को ना  छेड़ो जनाब,
की इनमे किसी का आशियाना बसा है।
इन होठों को मेरे होठों से लगाओ तो मेरी जान।,
की इनमे मेरी  मोहब्बत का पैमाना भरा है।।

एक शाम मुझे मिल तो सही,
तुझे मोहब्बत करना सिखा दूं।
एक रोज मेरे साथ मैखाने चल तो सही,
तुझे तन्हाई से दोस्ती करना सिखा  दूं।।

Thursday, 7 February 2013

MERI KAHANI.

ये जो मेरे पैरों की दरारें हैं,
ये दिखती तो सबको हैं,मगर कम्बक्त ,
चुभती शिर्फ़ मुझको हैं।
कोई लाखों तराने लिख जाता  है इन पर,
तो कोई मशहूर चित्रों से कर जाता है इनको।
अरबों में समाई इनकी कमाई है,मगर फिर भी,
फटी से साडी में बैठी वो मेरी लुगाई है।
मेरे मोहल्ले की बड़ी दूर तलक दुहाई है,
क्यूंकि यंहा हर एक के हाथों में,
जादे छाले होने की  लड़ाई है।
बड़े दिलकश से हैं ये वादे तुम्हारे,
माना की कर दोगे मशहूर इस शहर को,
अपनी इबारत से,मगर  हम तो होंगे ना ,
बड़ी दूर उस ईमारत से।
यंहा जूठन में पलती है जिंदगानी हमारी,
वंहा आप खाते हैं भरपेट लिखकर,
गरीबी की कहानी हमारी।
मौत भी होती है गुमनामी में हमारी और,
आप होते हैं मशहूर छाप कर मौत की कहानी हमारी।
इस शहर हाल है कुछ यूं  की
मौत है सस्ती बड़ी मगर कम्बक्त बड़ी महंगी,
यंहा जिंदगानी है।

                                                    P R A N I....

Saturday, 19 January 2013

UDASH

हंसी का नकाब ओढ़े इस चेहरे पे,
मैं हर वक़्त उदास रहता हूँ।
कुछ है  यदि अस्तित्व मेरा,
हर वक़्त उसकी  तलाश करता हूँ।
हर ठोकर खा गिरना,तो  है मुक़द्दर मेरा।
फिर भ़ी  हर नए मोड़ पर,
संभलने की आश  रखता हूँ।
कुछ जख्म  ऐसे हैं,इस बिगडैल ज़माने के,
की हर वक़्त उन्हें  भरने की चाह रखता हूँ।
मगर ये जमाना जालिम है कुछ इस कदर ,
की हर वक़्त एक नए नासूर की तलाश करता है।
शिष्य हूँ तुम्हारा चाहे कुछ भी पा लूं,
सदा चरणों में रहूँगा तुम्हारे ।
एह्शाश ये रखना जरूर ,
बनकर आंसू एक  आँखों से गिरूंगा।
तुम्हे उस रोज दिक्कत थी,
मेरे व्यवहार से,
मुझे हर रोज दिक्कत है,
उस तुम्हारे  एक वार से।
एक बार समझो तो मुझे,
एक बार जानो तो मुझे।
मै वो हूँ जो तुम्हारे लिए,
इस ज़माने को छोड़ जाने की चाह रखता हूँ।
खैर तुम ना समझोगे मुझे,
क्यूँकि तुम तो वो हो जो,
सिक्षक को व्यवसाई और,
सिक्षा को व्यवसाय समझते  हो।
मै आज के इस आधुनिक ज़माने में,
किसी पिछड़े  की तलाश करता हूँ।
ये तुम्हारा तोहफा ही है की,
हर वक़्त नफ़िक्रि थी शान  मेरी,
अब तो फिक्रमंदी ही है पहचान मेरी।
                                                                  PRANI...