Saturday, 1 December 2012

JHAROKHE KE BAHER

मेरे घर की एक दीवार जो मुह्हले की सड़क की ओर खुला करती है,
पहले उसमे एक झरोखा हुआ करता था ,और ,
मैं हर शाम उससे हाथ बाहर निकाल  मोहल्ले में झाँका करता था।
और आते जाते हर इंसान को  देख हाथ हिलाया करता था।
मगर,एक रोज मेरे घर वालो ने उसपे शीशा चढवा दिया,
तो अब मै चुपचाप उसके पीछे बैठ बाहर देखा करता था।
मोहल्ले में जो कुछ दीखता था,वो कुछ इस प्रकार थी,
एक नयी सी मस्जिद ,एक पुराना सा मंदिर,
एक पुरानी  सी नीम, एक छोटा सा चबूतरा,
और उसपे  बैठे कुछ लोग,जिन्हें मेरे पापा आवारा  करते थे।
खैर, एक दिन की बात है,
मुह्हले में इस बात पे तनातनी हो गयी की,
अगर मस्जिद नयी  है तो मंदिर भी  नया क्यूँ ना बने।
इस बात को सुरु तो पंडित जी और मौलवी जी ने किया था,
मगर बाद में हर कोई उस दंगे में पड़ गया  था।
उस समय ना जाने क्यूँ,
पिताजी ने मुझे भैया के यंहा भेज दिया।
कुछ सालों बाद जब मैं घर वापस आया तो,
कुछ देर बाद मुझे झरोखे की याद  आई,
मै  भाग कर उपर पंहुचा,
सीशा कुछ धुंधला हो गया था।
मैंने बाहेर झाँका,
ना तो नया मंदिर बना था और ना तो नयी मस्जिद,
हाँ   एक बदलाव था की अब तो,
मंदिर भी पुराना नजर आता है ,
मस्जिद भी पुरानी नजर आती है।
मगर  उस पुरानी  सी नीम के नीचे बैठे वही  लोग,
जिन्हें मेरे पापा आवारा कहा करते थे।।।।।।

                                                                     PRANI....

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