था शाम का हंसी सा शमा ,
निकले थे लैला और मजनू शैर पे।
था चल रहा अदभुत प्रेम प्रसंग,
थे खुश बड़े होकर के संग।
की इतने में हुआ उनका मोह भंग।
लैला का दुपट्टा किसी ने खिंचा,
उन दोनों का ध्यान उसने अपनी और भींचा।
मुड़कर जो देखा उन्होंने पीछे,
कांपते हाथो को किए आगे,
उस गुलाबी जाड़े में खड़ा नदीम था।
एक हरी सी निक्कर पारो में डाले,
और एक फटा सा लाल कुरता तन पर लपेटे,
उस गुलाबी जाड़े में खड़ा नदीम था।
"साहब कुछ खाने को हो तो देना,
ना हो अगर कुछ तो मुझे,
एक रूपया ही आगे बढ़ाना,
उतने में ही आज खा लूंगा मै,
कम से कम आज तो जी लूँगा मै।"
नदीम की उम्र थी वही कोई 12 साल,
चेहरा था सुखा और,
आँखे थी भूख से लाल।
मगर ना कुछ कह पाई वो उनसे,
और ना ही कुछ पढ़ पाए वो उनमे।
दोनों एक स्वर में ही बोले,
चलो मेरे यार आगे बढ़ो।
कांपते पाओं से आगे बढ़ गया वो नदीम,
फिर घने कोहरे में खो गया नदीम।
कुछ देर और बैठे वंहा वो,
फिर चले होटल को अपने,
डाल कर हाथो में हाथ।
शाम का भोजन लगा था,
लैला थी भूखी बहुत,
मजनू भी भूखा बहुत था।
अब थी आई बिल देने की बारी,
बिल हुआ था 1430,
मजनू ने टिप में दिए 20 ,
वेटर बोला" क्या शाहब केवल 20. "
लैला ने दिए उसको और 30.
लौट के आये कमरे में अपने,
बोली मजनू से लैला बड़े प्यार से,
जानू आज जरा जल्दी है सोना।
सुबह उठ के ऑडिटोरियम है जाना,
पर नीद नहीं है मुझको,
बस इसी चेह्लोकदम में रात गुजर जाती है,
और सबेरा उनका दरवाजा खटखटाता है।
लैला सज संवर के पंहुची वंहा पे,
हाथो में जन्हा थी सबके एक किताब,
सीर्सक था जिसका "garibi by laila khan"
और वन्ही बाजू में था एक कब्रिस्तान,
जिसमे था एक कब्र खोद रहा करीम,
जिसकी सिल था खुदा "NADEEM"
PRANI.....
निकले थे लैला और मजनू शैर पे।
था चल रहा अदभुत प्रेम प्रसंग,
थे खुश बड़े होकर के संग।
की इतने में हुआ उनका मोह भंग।
लैला का दुपट्टा किसी ने खिंचा,
उन दोनों का ध्यान उसने अपनी और भींचा।
मुड़कर जो देखा उन्होंने पीछे,
कांपते हाथो को किए आगे,
उस गुलाबी जाड़े में खड़ा नदीम था।
एक हरी सी निक्कर पारो में डाले,
और एक फटा सा लाल कुरता तन पर लपेटे,
उस गुलाबी जाड़े में खड़ा नदीम था।
"साहब कुछ खाने को हो तो देना,
ना हो अगर कुछ तो मुझे,
एक रूपया ही आगे बढ़ाना,
उतने में ही आज खा लूंगा मै,
कम से कम आज तो जी लूँगा मै।"
नदीम की उम्र थी वही कोई 12 साल,
चेहरा था सुखा और,
आँखे थी भूख से लाल।
मगर ना कुछ कह पाई वो उनसे,
और ना ही कुछ पढ़ पाए वो उनमे।
दोनों एक स्वर में ही बोले,
चलो मेरे यार आगे बढ़ो।
कांपते पाओं से आगे बढ़ गया वो नदीम,
फिर घने कोहरे में खो गया नदीम।
कुछ देर और बैठे वंहा वो,
फिर चले होटल को अपने,
डाल कर हाथो में हाथ।
शाम का भोजन लगा था,
लैला थी भूखी बहुत,
मजनू भी भूखा बहुत था।
अब थी आई बिल देने की बारी,
बिल हुआ था 1430,
मजनू ने टिप में दिए 20 ,
वेटर बोला" क्या शाहब केवल 20. "
लैला ने दिए उसको और 30.
लौट के आये कमरे में अपने,
बोली मजनू से लैला बड़े प्यार से,
जानू आज जरा जल्दी है सोना।
सुबह उठ के ऑडिटोरियम है जाना,
पर नीद नहीं है मुझको,
बस इसी चेह्लोकदम में रात गुजर जाती है,
और सबेरा उनका दरवाजा खटखटाता है।
लैला सज संवर के पंहुची वंहा पे,
हाथो में जन्हा थी सबके एक किताब,
सीर्सक था जिसका "garibi by laila khan"
और वन्ही बाजू में था एक कब्रिस्तान,
जिसमे था एक कब्र खोद रहा करीम,
जिसकी सिल था खुदा "NADEEM"
PRANI.....
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