Thursday, 7 February 2013

MERI KAHANI.

ये जो मेरे पैरों की दरारें हैं,
ये दिखती तो सबको हैं,मगर कम्बक्त ,
चुभती शिर्फ़ मुझको हैं।
कोई लाखों तराने लिख जाता  है इन पर,
तो कोई मशहूर चित्रों से कर जाता है इनको।
अरबों में समाई इनकी कमाई है,मगर फिर भी,
फटी से साडी में बैठी वो मेरी लुगाई है।
मेरे मोहल्ले की बड़ी दूर तलक दुहाई है,
क्यूंकि यंहा हर एक के हाथों में,
जादे छाले होने की  लड़ाई है।
बड़े दिलकश से हैं ये वादे तुम्हारे,
माना की कर दोगे मशहूर इस शहर को,
अपनी इबारत से,मगर  हम तो होंगे ना ,
बड़ी दूर उस ईमारत से।
यंहा जूठन में पलती है जिंदगानी हमारी,
वंहा आप खाते हैं भरपेट लिखकर,
गरीबी की कहानी हमारी।
मौत भी होती है गुमनामी में हमारी और,
आप होते हैं मशहूर छाप कर मौत की कहानी हमारी।
इस शहर हाल है कुछ यूं  की
मौत है सस्ती बड़ी मगर कम्बक्त बड़ी महंगी,
यंहा जिंदगानी है।

                                                    P R A N I....

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