Thursday, 18 October 2012

जब न्याय किसी निद्रित शव सा है पड़ा,
जब जर्जर हो चुके हैं समाज के स्तम्भ ,
और परम्पराओ के महलो में गूंजती हैं आवाजे दीमको की,
मन में एक चिंगारी उठती है बगावत  की।
जब ईमानदारी की राह में खुदी है खाई,
जब पैरवी होती है दहशतगर्दो  की ,
और सुरक्षा जरायम के रखवालो की,
मन में एक चिंगारी उठती है बगावत की।
जब कोशिशे होती है आत्मा के व्यापार की,
जब इक्षाशक्ति हो व्यवस्था  परिवर्तन की,
और आव्यसकता होती है पुनर्जागरण की।
तभी सुरुआत होती है बगावत की।
ये जो तुमने कोशिस की थी बगावत की,
इसमें निशानियाँ थीं आधी बगावत की।
अब चाहते ख़त्म हो चुकी है  स्वशासन की,
क्यूंकि अब आव्यसकता है तिलक के  स्वराज्य की।
जरूरते अब नहीं है आधी बगावत की।
अब है जरूरत ऐसी  बगावत की,
जिसमे राह छुपी हो इंसानियत की मुस्कराहट की।
                                                                       abhishek naman dwiz.

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